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चाट खाइए

खुद को खड़े हो दूर से न ललचाइए
आज बन्धु संग मेरे चाट खाइए ॥
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रस नहीं जो 'एस' में, जो है 'नॉट' में मज़ा।
बेड डबल में है कहाँ, जो खाट में मज़ा।
जायका खराब किया, अब तक इमरतियों में।
बाकी जिंदगानी में लें, चाट में मज़ा।
चाट में है तब मज़ा, जब बाँट खाइए।
आज बन्धु संग मेरे चाट खाइए।
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कुदरत की इज़ाद है, यह चाट की दुकान।
बरसों से आबाद है ये चाट की दुकान।
मंडरा रहे हैं राजा और रंक आसपास।
लाती समाजवाद है, ये चाट की दुकान।
आप भी दुकान को इक, छांट खाइए।
आज बन्धु संग मेरे चाट खाइए
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चटपटा खस्ता पकौड़ा बैंगनी आलू चना।
लो उठाओ ये सटल्ला खूब बढ़िया है बना।
खाइए भरपेट अब ललचाइए न दूर से।
लाख की हो डॉकटर ने चाट खाने से मना।
दूसरे दिन डॉकटर की डांट खाइए।
आज बन्धु संग मेरे चाट खाइए
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देख लो बिकती हैं, सरे आम फुल्कियाँ।
खा रहें हैं हैं, लोग पत्ते थाम फुल्कियाँ।
शराबियों तुम तोड़ दो, बोतल शराब की।
बोतल सी लग रही है, भरी जाम फुल्कियाँ।
छः सात नहीं पूरे एक सौ आठ खाइए।
आज बन्धु संग मेरे चाट खाइए
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पत्तों में कुछ अजीब है, ये ढाक का पत्ता।
कितना ख़ुशनसीब है, ये ढाक का पत्ता
ईर्ष्या से जल उठ्ठा, तब 'कमल' पत्र भी।
चाटती जब जीभ है, यह ढाक का पत्ता।
मन न भरे तो पात को ही काट खाइए।
आज बन्धु संग मेरे चाट खाइए
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